अवध में शृंगी कृत यज्ञ,श्रीराम आदि का जन्म


रामनगर(वाराणसी)काशीवार्ता। चौथेपन में भी संतान न होने से चिंतित राजा दशरथ गुरु बशिष्ठ से अपनी व्यथा व्यक्त करते है। बाद में उनकी आज्ञा से श्रृंगी ऋषि से पुत्रेष्टि यज्ञ कराया जाता है। यज्ञ की समाप्ति के बाद वहां प्रसन्न होकर अग्नि देव प्रकट होते है और राजा दशरथ को हव्य देते हुए उसे रानियों को खिलाने को कहते है। हव्य खाकर रानियां कौशल्या, कैकेयी, सुमित्रा गर्भवती होती है,इसके बाद नियत समय पर भगवान का जन्म होता है। वे चतुर्भुज रूप में कौशल्या को दर्शन देते है। तत्पश्चात बाल रूप में प्रकट होकर रोने लगते है। इसी प्रकार कैकेयी और सुमित्रा को क्रमश: एक और दो पुत्र जन्मते है। अयोध्या में चारो ओर खुशी की लहर दौड़ जाती है,सभी ओर बधाइयां दी जाने लगती है। चार पुत्र पाकर दशरथ फुले नही समाते,सबको उपहार आदि बांटा जाता है। बाद में चारो पुत्रों का नामकरण राम,भरत,लक्ष्मण और शत्रुघ्न के रूप में किया जाता है। इसके बाद भगवान के विराट रूप की झांकी होती है। माताएं हाथ जोड़ कर खड़ी हो जाती है। तत्पश्चात सभी का यज्ञोपवीत संस्कार होता है। इसके बाद सभी विद्याध्ययन के लिए जाते है।इसके बाद चारो भाइयों के क्रियाकलापों से राजपरिवार व अयोध्यावासी बड़े प्रसन्न होते हैं। श्री राम कौशलपुरवासियों को प्राणों से अधिक प्यारे हो जाते हैं। बाद में श्री राम सबके साथ आखेट करने जाते है और वापसी में मृगा को लेकर राजा दशरथ को दिखाते हुए कहते है कि इसका शिकार मैंने किया है। लीला का यही विश्राम होता है। यह लीला दुर्ग रोड स्थित अयोध्या जी के प्रांगण में होती है। आरती का समय रात्रि लगभग नौ बजे है। आरती कौशल्या जी करती है।
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खोजवां की रामलीला 17 से
खोजवां रामलीला समिति की तरफ से आयोजित होने वाली रामलीला का शुभारंभ 17 सितंबर को होगा। रामलीला एक किलो मीटर के दायरे में अलग अलग जगहों पर आयोजित होती है। रामलीला समिति के अध्यक्ष श्रीकांत सिंह ने बताया कि लीला का समापन धनतेरस के दिन होगा। भंडारा दीपावली के दूसरे दिन होगा।