महंगाई डायन खाने लगी है ‘दाल-रोटी’


(शिव यादव)
वाराणसी (काशीवार्ता)। मध्यम वर्गीय परिवार की दाल-रोटी पर इस समय महंगाई डायन नजर लगाए बैठी है। उत्तर भारत में आटा व दाल ही ऐसा खाद्य पदार्थ है जो अमूमन सभी वर्ग के लोगों की थाली में परोसा जाता है। रोज कमाने वाला हो या फिर कोई साहूकार, शाकाहारी भोजन के रूप में उक्त दोनों चीजें उसके थाली की शोभा बढ़ाती है। विगत कुछ दिनों से गेंहू के थोक दाम बढ़ने से आटा के दाम में अप्रत्याशित वृद्धि हो गयी है तो वहीं अरहर दाल की कीमत लगातार बढ़त बनाये हुई है। दाम में वृद्धि का यह आलम है कि लोग अब दाल- रोटी भी ‘हिसाब’ से खाने लगे हैं। वर्तमान में आटा का फुटकर दाम 32 रुपये किलो है(ब्रांडेड से कुछ कम)तो वहीं उच्च क्वालिटी की अरहर दाल 100 रुपये किलो के आसपास है। महंगाई की मार से मध्यमवर्गीय परिवार का बजट वर्तमान में एकदम बिगड़ चुका है। सबसे ज्यादा परेशान गरीब तबके के लोग हैं । वे अब भरपेट खाने से पहरेज करने लगे हैं। चावल, दाल, तेल के अलावा इस समय मौसम की मार से सब्जियों के भी भाव बढ़े हैं।
कभी उत्तर भारतीयों की थाली, जिसमें दाल-चावल, रोटी, सलाद, मौसमी सब्जियां स्वाद ग्रन्थियां को संतुष्टि प्रदान करती थीं लेकिन अब स्थिति इससे उलट दिखने लगी है। भोजन थाली पर सुरसा रूपी महंगाई की कुदृष्टि पड़ चुकी है। आटा, दाल व तेल के दामों का असर आज बाजार में स्थित रेस्टुरेंट, ढाबा पर भी प्रत्यक्ष रूप से देखने को मिल रहा है। एक रोटी की कीमत 10 से 15 रुपये तो दाल एक प्लेट 150 से 200 रुपए में बिक रही है।