शिवजी ने माता पार्वती को दिया था ज्ञान, इसलिए पड़ा ज्ञानवापी नाम


(राजीव सिंह ‘रानू’)
वाराणसी(काशीवार्ता)। श्री काशी विश्वनाथ मंदिर से सटी ज्ञानवापी मस्जिद एक बार फिर चर्चा में है। ताजा विवाद मस्जिद परिसर के अंदर मौजूद मां शृंगार गौरी की रोज पूजा-अर्चना की मांग को लेकर है। कोर्ट ने पूजा की मांग वाली याचिका के बाद मस्जिद में आर्कियोलॉजिकल सर्वे का आदेश दिया है। सर्वे का एक चरण पूरा हो चुका है। इसमें मस्जिद परिसर में शिवलिंग मिलने से जहां हिंदू समाज प्रफुल्लित है वहीं मुस्लिम पक्ष इसे फव्वारा बताकर ऊपरी अदालत में जा पहुंचा है। पर अब तक की कार्रवाई से
यह साफ हो गया है कि अब ज्ञानवापी का इतिहास बदलना तय है।
ये एक बहुत बड़ी और ऐतिहासिक घटना है, जिसने 353 वर्षों पुराने इस विवाद में न्याय मिलने की उम्मीद बढ़ा दी है। हालांकि इस विश्लेषण से पहले हमारे कुछ सवाल भी हैं। मुगल शासक औरंगजेब ने वर्ष 1669 में काशी विश्व नाथ मन्दिर को ध्वस्त करके ज्ञान वापी मस्जिद का निर्माण कराया था। यानी जिस जगह अभी मस्जिद है, वहां पहले भगवान शिव को समर्पित असली ज्योतिर्लिंग मौजूद था लेकिन बाद में औरंगजेब ने मन्दिर तुड़वा दिया और मस्जिद बनवा दी।
जब मन्दिर तोड़कर यहां मुगल शासक औरंगजेब ने मस्जिद बनवाई थी, तब किसी को आपत्ति नहीं थी। सैकड़ों वर्षों तक इस पर किसी ने कुछ नहीं कहा, लेकिन अब जब इस मामले में न्याय की बात उठ रही है तो हमारे देश के कट्टरपंथी इससे परेशान होने लगे हैं। जब ज्ञानवापी मस्जिद में सर्वेक्षण का काम शुरू हुआ तो इस दौरान मस्जिद परिसर में प्राचीन शिवलिंग मिलने की बात कही गई। दावा है कि इसी दौरान आदि विश्वेश्वर का प्राचीन शिवलिंग प्रकट हुआ, जिससे ये आधार मजबूत होने की बात कही जा रही है कि जिस जगह पर अभी मस्जिद है, वहां पहले भगवान शिव का प्राचीन मन्दिर और शिलालेख हुआ करते थे। हिन्दू पक्षकारों का ये भी दावा है कि वजू खाने के नीचे एक दीवार है, जिसे तोड़ कर प्राचीन मंदिर से जुड़े अन्य साक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं।
इसके मुताबिक इस दीवार के नीचे एक तहखाना हो सकता है, जिसमें शिलालेख और हिन्दू देवी देवताओं की अन्य मूर्तियां हो सकती हैं और बड़ी बात ये है कि हिन्दू पक्षकारों ने इसके सर्वे के लिए अदालत में अलग से जल्द एक याचिका लगाने की बात भी कही है। इसके अलावा वाराणसी कोर्ट में कल भी एक याचिका दायर की गई, जिसमें सर्वे के दौरान मिले साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की मांग की गई। इस पर अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से लिखा है कि जिस जगह शिवलिंग मिला है, उस जगह को स्थानीय प्रशासन द्वारा सील किया जाएगा और इस क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति को जाने की अनुमति नहीं होगी। ज्ञानवापी को हटाकर उसकी जमीन काशी विश्वनाथ मंदिर को सौंपने को लेकर दायर पहली याचिका अयोध्या में राम मंदिर मुद्दा गमार्ने के बाद 1991 में दाखिल हुई थी। तभी से इसे लेकर मुकदमेबाजी का दौर चल रहा है। इन्हीं मुकदमों में शामिल है पांच महिलाओं की ओर से दाखिल याचिका जिस पर सर्वे का आदेश दिया गया था।
ताजा विवाद ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में श्रृंगार गौरी और अन्य देवी-देवताओं की रोजाना पूजा-अर्चना को लेकर है। 18 अगस्त 2021 को 5 महिलाएं ज्ञानवापी मस्जिद परिसर में मां श्रृंगार गौरी, गणेश जी, हनुमान जी समेत परिसर में मौजूद अन्य देवताओं की रोजाना पूजा की इजाजत मांगते हुए हुए कोर्ट पहुंची थीं। अभी यहां साल में एक बार ही पूजा होती है। इन पांच याचिकाकतार्ओं का नेतृत्व दिल्ली की राखी सिंह कर रही हैं, बाकी चार महिलाएं सीता साहू, मंजू व्यास, लक्ष्मी देवी और रेखा पाठक बनारस की हैं।
मान्यता है कि 1669 में औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर का एक हिस्सा तोड़कर ज्ञानवापी मस्जिद बनवाई थी। कुछ इतिहासकार कहते हैं कि 14वीं सदी में जौनपुर के शर्की सुल्तान ने मंदिर को तुड़वाकर ज्ञानवापी मस्जिद बनवाई थी। कुछ मान्यताओं के अनुसार अकबर ने 1585 में नए मजहब दीन-ए-इलाही के तहत विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद बनवाई थी।
मस्जिद और विश्वनाथ मंदिर के बीच 10 फीट गहरा कुआं है, जिसे ज्ञानवापी कहा जाता है। इसी कुएं के नाम पर मस्जिद का नाम पड़ा। स्कंद पुराण में कहा गया है कि भगवान शिव ने स्वयं लिंगाभिषेक के लिए अपने त्रिशूल से ये कुआं बनाया था। भगवान शंकर ने यहीं माता पार्वती को ज्ञान दिया था, इसलिए इस जगह का नाम ज्ञानवापी या ज्ञान का कुआं पड़ा। आम जनमानस की मान्यताओं में यह कुआं सीधे पौराणिक काल से जुड़ता है।
ज्ञानवापी मस्जिद हिंदू और मुस्लिम आर्किटेक्चर का मिश्रण है। मस्जिद के गुंबद के नीचे मंदिर के स्ट्रक्चर जैसी दीवार नजर आती है। माना जाता है कि ये विश्वनाथ मंदिर का हिस्सा है, जिसे औरंगजेब ने तुड़वा दिया था। ज्ञानवापी मस्जिद का प्रवेश द्वार भी ताजमहल की तरह ही बनाया गया है। मस्जिद में तीन गुंबद हैं, जो मुगलकालीन छाप छोड़ते हैं। मस्जिद का मुख्य आकर्षण गंगा नदी के ऊपर की ओर उठी 71 मीटर ऊंची मीनारें हैं। ज्ञानवापी मस्जिद का एक टावर 1948 में आई बाढ़ के कारण ढह गया था।
कुतुबुद्दीन ने किया था मंदिर पर हमला
सबसे पहले 12वीं शताब्दी में कुतुबुद्दीन ऐबक ने हमला किया था। इस हमले में मंदिर का शिखर टूट गया था। लेकिन इसके बाद भी पूजा पाठ होती रही। वर्ष 1585 में राजा टोडरमल ने काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण कराया था। वो अकबर के नौ रत्नों में से एक माने जाते हैं लेकिन 1669 में औरंगजेब के आदेश पर इस मंदिर को पूरी तरह तोड़ दिया गया और वहां पर एक मस्जिद बना दी गई। वर्ष 1780 में मालवा की रानी अहिल्याबाई ने ज्ञानवापी परिसर के बगल में ही एक नया मंदिर बनवा दिया, जिसे आज हम काशी विश्वनाथ मंदिर के तौर पर जानते हैं।
ब्रिटिश स्कॉलर जेम्स प्रिंसेप का दावा
ब्रिटिश स्कॉलर जेम्स प्रिंसेप ने 1831 में अपनी पुस्तक इएठअएएर कछछवरळफअळएऊ, अ री१्री२ ङ्मा १िं६्रल्लॅ में ज्ञानवापी को लेकर लिखा था-‘‘यह दृश्य दक्षिण पश्चिम के कोने से ली गई है जहां आज जामा मस्जिद है। गुंबद और मीनार हिन्दू दीवारों से घिरी हुई है, प्राचीन कलाकृतियां इस तरह से हैं जिससे मुसलमान ये बता सके कि उनके धर्म की विजय हुई। वास्तविक ढाँचे को इसकी दीवारों को बिना ढहाए हुए मस्जिद से ढँक दिया गया। संपूर्ण वास्तुशिल्प आज भी पूरी तरह दृश्यमान है। एक हिन्दू गुंबद को उसी तरह छोड़ दिया गया। विश्वेश्वर मंदिर का वास्तविक शिवलिंग महादेव शिव का सच्चा प्रतिरूप लगता है। कहते हैं ये स्वर्ग से इसी स्थान पर गिरा और पत्थर में परिवर्तित हो गया। मुसलमान जब यहाँ तोड़ फोड़ कर रहे थे तब शिवलिंग ने खुद ज्ञान बापी में छलांग लगा दी । तब से कुएं को अंतगृही जात्रा या पवित्र परिक्रमा के तौर पर जाना जाता है। हालांकि पास में ही आधुनिक शिवाला बना के दिखाने की कोशिश की गई कि यहाँ ही वास्तविक लिंग है।
आजादी के पहले भी कोर्ट
में गया था ये मामला
आजादी से पहले वर्ष 1936 में भी ये मामला कोर्ट में गया था। तब हिंदू पक्ष नहीं, बल्कि मुस्लिम पक्ष ने वाराणसी जिला अदालत में याचिका दायर की थी और ये याचिका दीन मोहम्मद नाम के एक व्यक्ति ने डाली थी और उन्होंने कोर्ट से मांग की थी कि पूरे ज्ञानवापी परिसर को मस्जिद की जमीन घोषित किया जाए। वर्ष 1937 में इस पर फैसला आया, जिसमें दीन मोहम्मद के दावे को खारिज कर दिया गया लेकिन विवादित स्थल पर नमाज पढ़ने की अनुमति दे दी गई। इस मुकदमे में हिंदू पक्ष को पार्टी नहीं बनाया गया था लेकिन इस मुकदमे में कई ऐसे सबूत रखे गए थे, जो बहुत महत्वपूर्ण हैं। इसी केस की सुनवाई के दौरान अंग्रेज अफसरों ने 1585 में बने प्राचीन विश्वनाथ मंदिर का नक्शा भी पेश किया। इसमें बीच का जो हिस्सा है, वहीं पर प्राचीन मंदिर का गर्भगृह बताया जाता है। यह नक्शा जब कोर्ट में पेश किया गया तो अंग्रेज अफसरों ने बताया कि इसके ही कुछ हिस्से में मस्जिद बना दी गई है।
औरंगजेब क्रूर मुगल शासक था
जबकि औरगंजेब ने अपने शासनकाल में काशी विश्वनाथ समेत कई मन्दिरों को नष्ट कराया। हिन्दुओं पर जजिया कर लगा कर उनका दमन किया और हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराने की भी कोशिशें की और सबसे बड़ी बात, औरंगजेब वही मुगल शासक है, जिसके आदेश पर सिखों के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर की हत्या की गई थी। औरंगजेब इस बात से क्रोध में था कि उसके सैनिकों द्वारा कई यातनाएं देने के बाद भी गुरु तेग बहादुर इस्लाम धर्म को अपनाने के लिए तैयार नहीं थे और वो कश्मीरी पंडितों पर किए जा रहे अत्याचारों का भी पुरजोर विरोध कर रहे थे। यानी उस जमाने में गुरु तेग बहादुर ने इस्लामिक कट्टरपंथ के आगे अपना सिर झुकाने से बेहतर, अपना सिर कलम कराना बेहतर समझा। इसके अलावा औरंगजेब इतना क्रूर था कि उसने अपने पिता और मुगल शासक शाहजहां को भी नजरबन्द करके जेल में डाल दिया था और अपने बड़े भाई दारा शिकोह का भी सिर कलम करवा दिया था।