ज्ञानवापी के तहखानों का यह है राज


वाराणसी। 1992 में अयोध्या में बाबरी विध्वंस के बाद उन सभी मस्जिदों पर पहरा बढ़ा दिया गया, जिनके बारे में यह कहा जाता था कि इन मस्जिदों का निर्माण मंदिरों को तोड़कर किया गया है। इनमें एक ओर जहां मथुरा में कृष्ण जन्मस्थान मंदिर शामिल था तो दूसरी ओर बनारस की ज्ञानवापी मस्जिद थी। यहां मस्जिद को लोहे की ऊंची दीवारों से कवर कर दिया गया। ऐसे में 29 साल पहले यानी 1992 के बाद ज्ञानवापी परिसर के हर हिस्से में दफन राज अंदर ही रह गया था। बावजूद इसके सभी को उम्मीद थी कि इसके भीतर दफन राज किसी न किसी दिन जरूर बाहर आएगा।
वहीं, कानूनी अड़चनों की वजह से ज्ञानवापी परिसर में प्रवेश तो दूर इसकी दीवारों को छूना भी मुश्किल था। लेकिन श्रृंगार गौरी मामले में दायर याचिका के बाद बनाए गए कमीशन की कार्यवाही के तहत मस्जिद परिसर की वीडियोग्राफी सर्वे करने के आदेश के उपरांत शनिवार को वह चीजें बाहर आई जिसका इंतजार 29 सालों से हर किसी को था, क्योंकि 1992 में बाबरी विध्वंस के बाद 4 जनवरी, 1993 को तत्कालीन जिलाधिकारी सौरभ चंद्र के निर्देशन में मस्जिद के तीन कमरे, जिन्हें तहखाना कहा जाता है, में ताला लगा दिया गया। हालांकि, इसके पहले इन सभी तहखानों में आम जनमानस का आना-जाना लगा रहता था। इन तीनों तहखानों का राज अब 29 साल बाद फिर से बाहर आ रहा है, लेकिन यह जानना जरूरी है कि आखिर इन तहखानों की हकीकत क्या है? क्या वाकई में इनके अंदर सांपों का बसेरा है या फिर शिवलिंग या हिंदुओं की आस्था से जुड़े मंदिरों के अवशेष विद्यमान हैं? जब विवाद शुरू हुआ तो अंदर मौजूद दो तहखाने में से एक हिंदू पक्ष के पंडित सोमनाथ व्यास के पास रहा। जबकि दूसरा हिस्सा यानी दूसरा तहखाना मस्जिद की देखरेख करने वाली कमेटी अंजुमन इंतजामियां मसाजिद के हिस्से में गया। वहीं जिसे तीसरा तहखाना बताया जा रहा है, वो दरअसल तहखाना है ही नहीं, बल्कि श्रृंगार गौरी यानी पश्चिमी गेट पर स्थित मस्जिद की गैलरी से होते हुए ऊपर जाने का एक रास्ता है। रअसल, 18 अप्रैल, 1669 को औरंगजेब ने पुराने श्री काशी विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त करके वहां ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण करवाया था। उस वक्त मुगलों के आगे किसी की नहीं चली थी, लेकिन जैसे-जैसे समय बीतता गया और देश आजाद हुआ तो उसके बाद इस पुराने मंदिर परिसर को लेकर कागजी कार्यवाही शुरू हुई। ज्ञानवापी परिसर में हमेशा से ही व्यास परिवार का कब्जा हुआ करता था और कानूनी दस्तावेजों पर गौर करें तो पाएंगे कि ज्ञानवापी परिसर और ज्ञानवापी मस्जिद में मौजूद दो तहखाने में से एक के मालिक पंडित बैजनाथ व्यास ने अपनी वसीयत अपने नाती पंडित सोमनाथ व्यास समेत अन्य तीन नातियों के नाम कर दी। जिसमें ज्ञानवापी समेत मस्जिद परिसर में मौजूद एक तहखाने और ज्ञानवापी हाता व यहां मौजूद उनके घर पर नातियों का हक हो गया।
1991 में पंडित सोमनाथ व्यास ने 610/1991 के तहत कोर्ट में लॉर्ड विश्वेश्वर विश्वनाथ वर्सेस अंजुमन इंतजामियां मसाजिद के खिलाफ एक केस दायर किया, जिसमें तीन अन्य वादी बनाए गए. इसमें उन्होंने ज्ञानवापी परिसर और मस्जिद पर हिंदुओं का हक बताया और इस पर पूजा-पाठ का अधिकार मानते हुए इसे हिंदुओं को सुपुर्द करने की मांग की और यहीं से इस पूरे मामले में विवाद शुरू हुआ. हालांकि, 2019 में अधिवक्ता विजय शंकर रस्तोगी ने कोर्ट से इस पूरे प्रकरण में ज्ञानवापी मस्जिद का पुरातात्विक सर्वेक्षण कराने की मांग की थी, लेकिन अंजुमन इंतजामियां ने इस पर स्टे ले लिया और मामला हाईकोर्ट में चला गया. इस विवाद के बाद श्रृंगार गौरी मामले ने तूल पकड़ लिया और नियमित दर्शन को लेकर 5 महिलाओं ने एक याचिका दायर की, जिसमें कमीशन बनाने की मांग की गई. साथ ही कोर्ट ने नए सिरे से ज्ञानवापी परिसर में सर्वे कराने के आदेश दिए. वहीं, सबसे बड़ी बात यह है कि 6-7 मई को कार्यवाही शुरू हुई, लेकिन वो पूरी नहीं हो सकी। इसके बाद शनिवार यानी 14 मई को फिर से कोर्ट के आदेश पर ज्ञानवापी परिसर में स्थित तीनों तहखानों की सर्वे को टीम पहुंची, जिसमें कई राज दफन होने का अंदेशा है. इस बीच नाटकीय तरीके से चीजों लगातार सामने आती रही और बयानों के दौर भी चले।