मनोज सिन्हा का सियासी वारिस कौन!


(अजीत सिंह)
गाजीपुर (काशीवार्ता)। जम्मू एवं कश्मीर के एलजी, गाजीपुर से तीन बार सांसद एवं एक बार केंद्रीय मंत्री रहे मनोज सिन्हा के सियासी भविष्य को लेकर अभी से कयासबाजी तेज हो गई है। कुछ उनके सियासी वारिश को लेकर सवाल दाग रहे हैं तो कुछ उन्हें 2024 का गाजीपुर से सांसद बता रहे हैं।
गाजीपुर की सियासत का मनोज सिन्हा एक ऐसा नाम है, जिसने अपने सियासी कैरियर में सिर्फ संघर्ष किए। उन्होंने वर्ष 1984 से गाजीपुर लोकसभा का चुनाव लड़ना शुरू किया था। बीएचयू से एमटेक की शिक्षा प्राप्त करने वाले मनोज सिन्हा ने अपने जीवनकाल में 1984, 1989, 1991 लगातार तीन लोकसभा चुनाव हार गए। फिर उनकी किस्मत जगी और सहानुभूति का वोट उन्हें मिला और 1996 में जीत का स्वाद पहली बार चखा । फिर 1998 में जब मध्यवधि चुनाव हुए तो सपा के ओमप्रकाश सिंह से हार का सामना करना पड़ा। 1999 में पूरे देश में एनडीए की लहर थी। मनोज सिन्हा ने अपनी हार का बदला सांसद रहे ओमप्रकाश सिंह लेते हुए पूरे पांच वर्ष तक सांसद रहे। उस समय केंद्र और प्रदेश में भाजपा की सरकार थी। मगर जब 2004 में लोकसभा चुनाव हुए और भाजपा नेता के इंडिया साइन वाले नारे को जनता ने नकार दिया। इधर गाजीपुर लोकसभा क्षेत्र की जनता भी भाजपा के खिलाफ थी। समाजवादी पार्टी के टिकट से चुनाव लड़ने वाले अफजाल अंसारी ने मनोज सिन्हा को पहली बार पटखनी दी। 2004 का लोकसभा चुनाव हारने के बाद मनोज सिन्हा को सियासी रूप से तगड़ा झटका लगा और उन्होंने अपनी लोकसभा सीट बदल दी। वह 2009 में बलिया चले गए। ऐसा कहा जाता है कि बलिया लोकसभा सीट में उनके समाज के लोगों की संख्या अधिक थी। गाजीपुर जिले की जहूराबाद एवं मुहम्मदाबाद विधानसभा सीट बलिया लोकसभा में शामिल है। यहां पर भी मनोज सिन्हा को सपा के तत्कालीन प्रत्याशी एवं पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चंद्रशेखर के पुत्र नीरज शेखर से हारना पड़ा। हालांकि नीरज अब भाजपा में है। इधर 1999 के बाद लगातार मिल रही हार ने मनोज सिन्हा के जीवन को सियासी रूप से कमजोर कर दिया था। प्रदेश एवं केंद्र में कांग्रेस और सपा बसपा की सरकारें आती गईं। क्षेत्रीय पार्टियों का पूरी तरह से कब्जा रहा। 2014 के चुनाव से पूर्व पूरे देश में कांग्रेस नीति यूपीए सरकार को लेकर गुस्सा था। लोग अन्ना हजार के आंदोलन से जुड़ना चाहते थे। केंद्र की सरकार को हटाना चाहते थे। तब तक मोदी पीएम पद के उम्मीदवार घोषित हो चुके थे। वह 2014 में पीएम बने तो गाजीपुर से मनोज सिन्हा लोकसभा सांसद के बाद केंद्रीय मंत्री बने और जिले के विकास में हजारों करोड़ खर्च हुए। लेकिप इस समय यहां विकास शांत बैठा है। अब 2024 का लोकसभा चुनाव आने वाला है। सभी दल तैयारी कर रहे हैं। भाजपा में भी कानाफूसी चल रही है। लोग कह रहे हैं कि भाजपा एलजी को बैक करेगी या फिर किसी नए चेहरे पर दांव लगाएगी। सियासत के जानकार कहते हैं कि इस सवाल का जवाब दशहरा के बाद लोगों को मिल जाएंगे। वैसे यह सीट राजपूत बाहुल्य बताई जाती है। यहां पर दो लाख से अधिक राजपूत मतदाता किसी का खेल बना और बिगाड़ सकते हैं।